हमें बचपन से सीख मिली होती है की झूठ बोलना पाप है, झूठ का सहारा लेना अनैतिक और अक्षम्य है; हमें इस से बचना चाहिए।
फिर भी लोग हर रोज, हर दिन झूठ बोलते क्यों हैं ! ऐसा क्या है जो लोगों को झूठ बोलने को प्रेरित करता है ? आखिर इसका कारण क्या है ?
ये प्रश्न मेरे मन में ऐसे ही मंडराते रहे। लोगों को देखने , समझने, और परखने के बाद पाया की अलग-अलग लोगों के लिए झूठ बोलने के बिल्कुल अलग-अलग कारण हो सकते हैं। मतलब लाख लोगों के लाख अलग-अलग कारण। परन्तु जब गहराई में झाँका तो पाया कि मूलतः इन सबके पीछे कुछ निहित भावनाएं हैं जो व्यक्ति को असत्य का सहारा लेने के लिए विवश करती हैं।
मैंने पाया कि मान, माया, लोभ, क्रोध आदि ऐसी कुछ भावनाएं है जो लोगों को झूठ बोलने के लिए प्रेरित करती हैं। कोई वस्तु प्राप्त करनी है, मान प्राप्त करना है, या लक्ष्मी प्राप्त करनी है, कुछ तो चाहिए ; और व्यक्ति उसके लिए झूठ बोलता है या बोलने लग जाता है।
या फिर किसी बात का भय है, भय के मारे भी मनुष्य झूठ बोलता है। अंदर छुपा-छुपा भय है कि "कोई मुझे क्या कहेगा?" फिर धीरे-धीरे झूठ की आदत ही पड़ जाती है। फिर भय नहीं होता तो भी व्यक्ति झूठ बोल लेता है। अधिकाँश विश्व -प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि इन सब भावों में से सबसे बड़ा भय है :आत्म -सम्मान की चिंता। हमें जैसे ही आत्म -सम्मान पर आंच आती नजर आती है, हम और ऊँचे दर्ज़े की झूठ बोलने लग जाते हैं |
सामाजिक ताने-बाने को बनाये रखने, दूसरे की भावनाओं को ठेश न पहुंचाने, या फिर सामने वाले को अच्छा महसू कराते रहने के लिए भी लोग झूठ का सहारा लेते रहते हैं । इसे आप "जीवन को आसान बनाने वाले झूठ" भी कह सकते हैं। परन्तु ये जीवन को आसान नहीं घातक बनाते हैं।
मेरी दृष्टि में आत्म-सम्मान की चिंता झूठ का मूल कारण है: अगर आप ध्यान से सोचें तो, हम सब ने अपने मन में खुद का एक आदर्श प्रतिबिम्ब बना लिया होता है, और खुद को वैसा सोचकर खुश होते रहते हैं। हमारी आदर्श प्रतिबिम्ब हमसे जितनी अलग होती है, हम उतना ही ज्यादा झूठ बोलते हैं। दूसरों की नज़र में और खुद की नज़र में भी, अपने प्रतिबिम्ब जैसा दिखने के लिए।
मतलब आप दुनिया के सामने खुद का जो रूप पेश करना चाहते हैं, वैसा झूठ का सहारा लेने लगते हैं। यह बहुत ही मुश्किल हो सकता है, क्योकि आप अलग-अलग लोगों की नज़र में अलग-अलग दिखना चाह सकते हैं। आप मेरे साथ सहमत होंगे कि कुछ लोग समय के साथ इसमें महारथ हासिल कर लेते हैं। उनके पास हर परिस्थिति के लिए सही उत्तर होता है। आपको लगेगा मैं तो यही सुन ना चाह रहा था, इसने तो मेरे मुंह की बात छीन ली और ऐसा आपको हर घडी , हर पल, हर वार्तालाप और हर परिस्थिति में लगेगा।
वास्तव में वे चाह रहे होते हैं की आप ऐसा ही सोचें। क्योंकि सच असहज हो सकता है, और आपके नज़र में उनका प्रतिबिम्ब बदल सकता है। वे चाहते हैं की आप उन्हें पसंद करें, उनसे प्रभावित हों और उन्हें मान दें। उन्हें डर होता है की सच सुनकर आप उनसे दूर चले जाएंगे या अपनी भावनाओ को सीमित कर लेंगे, और यही डर उन्हें झूठ बोलने का आदी बना देता है।
वे अपना प्रतिबिम्ब बनने की जद्दो-जहद में झूठ में इतना मशगूल हो जाते हैं कि खुद को ही भूल जाते हैं। वे भूल जाते हैं कि उनकी सच्चाई उनके झूठ से कहीं बेहतर है। वे भूल जाते हैं की झूठ बोलने और उसको निभाने की आपा-धापी में वो जितनी मशक़्क़त करते हैं, उतनी ही सरलता से अगर अपना सच प्रस्तुत करें तो उन्हें ज्यादा मान और अपनापन मिलेगा। उनके सामने वाला व्यक्ति भी उतने ही खुले मन से अपने आप को पेश कर पायेगा। परिणामस्वरूप, सतही स्तर की बजाय गहराई से भावनात्मक लगाव होगा। उनके भय के ठीक विपरीत, रिश्ते क्षणभंगुर और कमज़ोर नहीं बल्कि मजबूत और दूरगामी होंगे।
मित्रों, सच बोलना दुनिया का सबसे आसान काम है। इस से आपके मन में शान्ति रहती है और ज़िन्दगी में खुशहाली बनी रहती है। झूठ के सहारे बने रिश्ते क्षणिक और दुखदायी होते हैं। झूठ एक ऐसा रोग है जो एक ना एक दिन खुल कर सामने आ ही जाता है और फिर उस दिन आप रिश्ते के साथ-साथ उस व्यक्ति को भी सदा के लिए खो देते हैं।
दोस्तों सच्चे और अच्छे मन से किये गए सतत प्रयास से दुनिया में कुछ भी हासिल किया जा सकता है। बात-चीत से किसी भी समस्या का हल निकाला जा सकता है, और प्यार और ईमानदारी से करोड़ों दिलों पर राज किया जा सकता है।
अतः मन, विचार और कर्म में सच्चाई लाएं। ज़िन्दगी आसान और बहुत ही खूबसूरत हो जायेगी।
फिर भी लोग हर रोज, हर दिन झूठ बोलते क्यों हैं ! ऐसा क्या है जो लोगों को झूठ बोलने को प्रेरित करता है ? आखिर इसका कारण क्या है ?
ये प्रश्न मेरे मन में ऐसे ही मंडराते रहे। लोगों को देखने , समझने, और परखने के बाद पाया की अलग-अलग लोगों के लिए झूठ बोलने के बिल्कुल अलग-अलग कारण हो सकते हैं। मतलब लाख लोगों के लाख अलग-अलग कारण। परन्तु जब गहराई में झाँका तो पाया कि मूलतः इन सबके पीछे कुछ निहित भावनाएं हैं जो व्यक्ति को असत्य का सहारा लेने के लिए विवश करती हैं।
मैंने पाया कि मान, माया, लोभ, क्रोध आदि ऐसी कुछ भावनाएं है जो लोगों को झूठ बोलने के लिए प्रेरित करती हैं। कोई वस्तु प्राप्त करनी है, मान प्राप्त करना है, या लक्ष्मी प्राप्त करनी है, कुछ तो चाहिए ; और व्यक्ति उसके लिए झूठ बोलता है या बोलने लग जाता है।
या फिर किसी बात का भय है, भय के मारे भी मनुष्य झूठ बोलता है। अंदर छुपा-छुपा भय है कि "कोई मुझे क्या कहेगा?" फिर धीरे-धीरे झूठ की आदत ही पड़ जाती है। फिर भय नहीं होता तो भी व्यक्ति झूठ बोल लेता है। अधिकाँश विश्व -प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि इन सब भावों में से सबसे बड़ा भय है :आत्म -सम्मान की चिंता। हमें जैसे ही आत्म -सम्मान पर आंच आती नजर आती है, हम और ऊँचे दर्ज़े की झूठ बोलने लग जाते हैं |
सामाजिक ताने-बाने को बनाये रखने, दूसरे की भावनाओं को ठेश न पहुंचाने, या फिर सामने वाले को अच्छा महसू कराते रहने के लिए भी लोग झूठ का सहारा लेते रहते हैं । इसे आप "जीवन को आसान बनाने वाले झूठ" भी कह सकते हैं। परन्तु ये जीवन को आसान नहीं घातक बनाते हैं।
मेरी दृष्टि में आत्म-सम्मान की चिंता झूठ का मूल कारण है: अगर आप ध्यान से सोचें तो, हम सब ने अपने मन में खुद का एक आदर्श प्रतिबिम्ब बना लिया होता है, और खुद को वैसा सोचकर खुश होते रहते हैं। हमारी आदर्श प्रतिबिम्ब हमसे जितनी अलग होती है, हम उतना ही ज्यादा झूठ बोलते हैं। दूसरों की नज़र में और खुद की नज़र में भी, अपने प्रतिबिम्ब जैसा दिखने के लिए।
मतलब आप दुनिया के सामने खुद का जो रूप पेश करना चाहते हैं, वैसा झूठ का सहारा लेने लगते हैं। यह बहुत ही मुश्किल हो सकता है, क्योकि आप अलग-अलग लोगों की नज़र में अलग-अलग दिखना चाह सकते हैं। आप मेरे साथ सहमत होंगे कि कुछ लोग समय के साथ इसमें महारथ हासिल कर लेते हैं। उनके पास हर परिस्थिति के लिए सही उत्तर होता है। आपको लगेगा मैं तो यही सुन ना चाह रहा था, इसने तो मेरे मुंह की बात छीन ली और ऐसा आपको हर घडी , हर पल, हर वार्तालाप और हर परिस्थिति में लगेगा।
वास्तव में वे चाह रहे होते हैं की आप ऐसा ही सोचें। क्योंकि सच असहज हो सकता है, और आपके नज़र में उनका प्रतिबिम्ब बदल सकता है। वे चाहते हैं की आप उन्हें पसंद करें, उनसे प्रभावित हों और उन्हें मान दें। उन्हें डर होता है की सच सुनकर आप उनसे दूर चले जाएंगे या अपनी भावनाओ को सीमित कर लेंगे, और यही डर उन्हें झूठ बोलने का आदी बना देता है।
वे अपना प्रतिबिम्ब बनने की जद्दो-जहद में झूठ में इतना मशगूल हो जाते हैं कि खुद को ही भूल जाते हैं। वे भूल जाते हैं कि उनकी सच्चाई उनके झूठ से कहीं बेहतर है। वे भूल जाते हैं की झूठ बोलने और उसको निभाने की आपा-धापी में वो जितनी मशक़्क़त करते हैं, उतनी ही सरलता से अगर अपना सच प्रस्तुत करें तो उन्हें ज्यादा मान और अपनापन मिलेगा। उनके सामने वाला व्यक्ति भी उतने ही खुले मन से अपने आप को पेश कर पायेगा। परिणामस्वरूप, सतही स्तर की बजाय गहराई से भावनात्मक लगाव होगा। उनके भय के ठीक विपरीत, रिश्ते क्षणभंगुर और कमज़ोर नहीं बल्कि मजबूत और दूरगामी होंगे।
मित्रों, सच बोलना दुनिया का सबसे आसान काम है। इस से आपके मन में शान्ति रहती है और ज़िन्दगी में खुशहाली बनी रहती है। झूठ के सहारे बने रिश्ते क्षणिक और दुखदायी होते हैं। झूठ एक ऐसा रोग है जो एक ना एक दिन खुल कर सामने आ ही जाता है और फिर उस दिन आप रिश्ते के साथ-साथ उस व्यक्ति को भी सदा के लिए खो देते हैं।
दोस्तों सच्चे और अच्छे मन से किये गए सतत प्रयास से दुनिया में कुछ भी हासिल किया जा सकता है। बात-चीत से किसी भी समस्या का हल निकाला जा सकता है, और प्यार और ईमानदारी से करोड़ों दिलों पर राज किया जा सकता है।
अतः मन, विचार और कर्म में सच्चाई लाएं। ज़िन्दगी आसान और बहुत ही खूबसूरत हो जायेगी।



Nice Kanchan...Authentic questions...I was thinking in the same line for the past few weeks, why do people change? Have not poured much thoughts, though...
ReplyDeleteThank you so much sirjee. Yeah, when I experience it around, It constantly keeps on haunting me. I find writing is the best way to vent it out.
DeleteKavi kavi esliye bhi bol dete hai ki samne wala chinta na karne lage.. jyada tar family ke mamle me
ReplyDelete👍👍
ReplyDelete👍Bahut badhiya bhaiya
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